add
रविवार, 25 अक्टूबर 2009
रिवाज
दरवाजे पर दो कच्चे बांस, कफन और धूप-दीप पडा देखकर पडोसी समझ गये यहां कोई मरा है। लेकिन अंदर से कोई रोने-गाने की आवाज नहीं आ रही थी। पडोसियों को आश्चर्य हुआ और जिज्ञासा भी कि मौत के माहौल में भी लोग शांत रह लेते हैं।
एक घंटा के अंदर पडोसी बिना बुलाए मंहगाई की तरह दरवाजे पर जमा होने लगे। उनमें से कुछ लोग बांस काटकर अरथी बनाने में लग गये तो कुछ लोग संभावित मुर्दा के बारे में अनुमान लगाने में। समय गुजरता रहा। दरवाजे पर जमा भीड के शोरगुल ने गृहस्वामी को बाहर निकाल ही दिया।
गृहस्वामी बीस-बाईस साल का युवक था, जिसको देखकर लोगों ने सहज ही अनुमान लगा लिया कि इसको अभी कर्मकांड का अनुभव नहीं है। इसीलिए अरथी उठाने में विलम्ब हो रहा है। भीड ने पूछा- भगवान ने किसको अपने पास बुलाया?
लडका-मेरे बाप को घाट ले जाना है। इतना कह कर लडका अंदर चला गया। भीड में फिर चर्चा होने लगी कि- लडका बहुत उजड्ड है। उसके चेहरे पर दु:ख का कोई लक्षण तक नहीं है। पालतू कुत्ते के मरने पर भी लोग दु:खी होते हैं, इसका तो बाप ही मरा है। लेकिन लडके की बोली तो सुनो।
बाहर पडोसी और अरथी मुर्दा के बाहर आने की प्रतीक्षा करते रहे और समय गुजरता रहा। ऊबकर भीड ने लडके को बाहर बुलाकर पूछा- घाट जाने में अभी और कितनी देर है?
लडका बोला- अभी मैं निर्णय कर रहा हूं कि इसका दाह संस्कार का आरंभ घर से किया जाय कि घाट से। भीड में फिर शोर उठा- ये क्या पागलों वाली बात है? दाह संस्कार तो घाट पर ही होता है।
लडका- शादी-विवाह और कर्म-कांड तो सभी के यहां होता है। लेकिन सभी के यहां के रिवाज एक सा तो नहीं होता है। खैर जब पंचों की मर्जी है कि दाह संस्कार का आरंभ घाट पर ही हो तो ऐसा ही होगा, चला जाये घाट की ओर।
भीड फिर बाहर प्रतीक्षा करने लगी। पांच-दस मिनट में लडके ने अपने बाप को लाकर अरथी पर लिटा दिया। भीड जब अरथी सजाने लगी तो मुर्दा बोला- अभी तो मैं जिंदा हूं। भीड में फिर शोर उठा- बाप अभी जिंदा है और लडका उसे मारने पर तुला है। क्या समय आ गया है? बाप को दो रोटी देना भी लडकों को अखरता है।
लडका- बात रोटी की नहीं है। बात रिवाज की है। आदमी के जीवन-मृत्यु का हिसाब तो ऊपर से ही तय होता है। मेरे यहां का रिवाज है कि दाह संस्कार जीते जी ही किया जाता है। जब मैं पांच-छ: साल का बच्चा था, तो इस आदमी ने मेरी मां का दाह संस्कार जीते जी ही सम्पन्न किया था। भले ही इसे उसके लिए उम्र कैद की सजा हो गयी। समाज या कानून भले ही इसे हत्यारा, पत्नीहन्ता चाहे जो भी कहे, है तो मेरा बाप। मुझे तो अपनी मां की आत्मा की शांति के लिये खानदानी रिवाज निभाना ही होगा।
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009
स्टेशन पे एक कुली से बाहर जाने का रास्ता पूंछा
स्टेशन पे एक कुली से बाहर जाने का रास्ता पूंछा .कुली ने कहा: " बाहर जाके पूंछो ."मैंने ख़ुद हीरास्ता ढूंढ़ लिया ,बाहर जाके टैक्सी वाले से पूंछा :" भाई साहब लाल किले का कितना लोगे ?"जवाब मिला: " बेचना नही है ."टैक्सी छोड़ , मैंने बस पकड़ ली ,कंडक्टर से पूंछा: "जी , क्या मैं सिगरेट पी सकता हूँ ?"वो गुर्र्रा कर बोला : "हरगिज़ नही , यहाँ सिगरेट पीना मन है."मैंने कहा: "पर वो जनाब तो पी रहे है!"फिर से गुर्र्र्राया : "उसने मुझसे पूंछा नही है."लाल किले पंहुचा , होटल गया .मेनेजर से कहा: "मुझे रूम चाहिए , सातवी मंजिल पे ."मेनेजर ने कहा: "रहने के लिए या कूदने के लिए ?"रूम पंहुचा , वेटर से कहा:" एक पानी का गिलास मिलेगा ?"उसने जवाब दिया: "नही साहब , यहाँ तो सारे कांच के मिलते हैं."होटल से निकला , दोस्त के घर जाने के लिए ,रास्ते में एक साहब से पूंछा:" जनाब , ये सड़क कहाँ को जाती है ?"जनाब हंस कर बोले: "पिछले बीस साल से देख रहा हूँ , यही पड़ी है... कहीं नहीं जाती."
Mahak Singh
Mahak Singh
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
Commonwealth Games 2022 Days 6
Commonwealth Games 2022 Day 6: राष्ट्रमंडल खेल 2022 में अब तक भारत ने कुल 18 पदक जीते हैं, जिसमें पांच स्वर्ण, छह रजत और सात कांस्य पदक श...
-
मुंबई। पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ एकमात्र भारतीय हैं जिन्हें अब तक आईसीसी क्रिकेटर ऑफ द ईयर का पुरस्कार मिला है और अब उनके तीन साथी इ...
-
एक दिन जंगल में बाघ को पकड़ने एक शिकारी आया उसने गुफा से थोड़ी दूर पर एक गहरा गड्ढा खोदकर उसे घास फूस से ढक दिया...
-
अपने हिसाब से जियो........ लोगो की सोच का क्या? वो तो कण्डीशन के हिसाब से बदलती रहती है अगर चाय में मक्खी गिर जाये , तो चाय को फेक देते ह...