भारत भर में ज्यादातर हिंदू परिवारों में भगवान गणेश की पूजा होती है। सनातन धर्म को मानने वाले सभी संप्रदाय विघ्नेश्वरगणेश की पूजा सबसे पहले करते हैं। महाराष्ट्र में मराठा श्रद्धालु गणपति को अपना आराध्य मानते हैं।
श्रीमंत पेशवा-सरकार गणेशजीकी उपासक थीं। उनके शासनकाल में गणेशोत्सवराजकीय ठाट-बाट के साथ मनाया जाता था। श्रीमंत सवाई माधवराव के शासनकाल में यह महोत्सव शनिवारवाडाके गणेश महल में आयोजित होता। उस समय यह उत्सव छ:दिनों तक चलता था। गणेशजीकी प्रतिमा के विसर्जन की शोभायात्रा ओंकारेश्वरघाट पहुंचती, जहां नदी में विग्रह का होता था विसर्जन। इसी तरह अन्य मराठा सरदारों के यहां भी गणेशोत्सवआयोजित होते।
दस दिनों का त्योहार :वर्ष 1892ई. तक मराठा-नरेशों के महलों तक सीमित था गणेशोत्सव।लोकमान्य तिलक की प्रेरणा और प्रयासों से वर्ष 1893ई. में पुणे में इसे सार्वजनिक रूप से मनाने की शुरुआत हुई। उन्होंने छ:दिनों के इस धार्मिक अनुष्ठान को दस दिन का सार्वजनिक उत्सव बना दिया। गणेश पुराण के अनुसार, भादो माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी के दिन गणेशजीप्रकट हुए।
इसलिए भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्थी के दिन गणेश-प्रतिमा की स्थापना और भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्दशी को विसर्जन की प्रथा बन गई। राष्ट्रीय उत्सव : केसरी पत्रिका में उस समय के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी खानखोजेने यह विचार प्रकट किया था कि पुणे में लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में गणेश-उत्सव न केवल देशभक्ति के प्रचार का माध्यम, बल्कि राष्ट्रीय उत्सव भी बन गया। पूणेके अलावा, मुंबई, अमरावती, वर्धा, नागपुर में भी सार्वजनिक गणेश-उत्सव मनाया जाने लगा। सच तो यह है कि इस उत्सव के माध्यम से क्रांतिकारियों को संगठित करने का कार्य होने लगा। धार्मिक उत्सव होने के कारण अंग्रेज सरकार भी इसमें हस्तक्षेप नहीं कर पाती थी।
श्रीमंत पेशवा-सरकार गणेशजीकी उपासक थीं। उनके शासनकाल में गणेशोत्सवराजकीय ठाट-बाट के साथ मनाया जाता था। श्रीमंत सवाई माधवराव के शासनकाल में यह महोत्सव शनिवारवाडाके गणेश महल में आयोजित होता। उस समय यह उत्सव छ:दिनों तक चलता था। गणेशजीकी प्रतिमा के विसर्जन की शोभायात्रा ओंकारेश्वरघाट पहुंचती, जहां नदी में विग्रह का होता था विसर्जन। इसी तरह अन्य मराठा सरदारों के यहां भी गणेशोत्सवआयोजित होते।
दस दिनों का त्योहार :वर्ष 1892ई. तक मराठा-नरेशों के महलों तक सीमित था गणेशोत्सव।लोकमान्य तिलक की प्रेरणा और प्रयासों से वर्ष 1893ई. में पुणे में इसे सार्वजनिक रूप से मनाने की शुरुआत हुई। उन्होंने छ:दिनों के इस धार्मिक अनुष्ठान को दस दिन का सार्वजनिक उत्सव बना दिया। गणेश पुराण के अनुसार, भादो माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी के दिन गणेशजीप्रकट हुए।
इसलिए भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्थी के दिन गणेश-प्रतिमा की स्थापना और भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्दशी को विसर्जन की प्रथा बन गई। राष्ट्रीय उत्सव : केसरी पत्रिका में उस समय के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी खानखोजेने यह विचार प्रकट किया था कि पुणे में लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में गणेश-उत्सव न केवल देशभक्ति के प्रचार का माध्यम, बल्कि राष्ट्रीय उत्सव भी बन गया। पूणेके अलावा, मुंबई, अमरावती, वर्धा, नागपुर में भी सार्वजनिक गणेश-उत्सव मनाया जाने लगा। सच तो यह है कि इस उत्सव के माध्यम से क्रांतिकारियों को संगठित करने का कार्य होने लगा। धार्मिक उत्सव होने के कारण अंग्रेज सरकार भी इसमें हस्तक्षेप नहीं कर पाती थी।