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मंगलवार, 17 नवंबर 2009

आदिवासी कल्याण की योजनाये सफल क्यो नही ?

आदिवासियों को समाज की मुख्य धारा मे लाने के लिए न जाने कितनी योजनाये सरकार ने बनाई किंतु आज तक उसका सही प्रतिफल उनको नही मिला ,आख़िर क्यो? क्या आदिवासी विकास नही चाहते और जैसे है वैसे ही रहना चाहते है ? नही! आदिवासी भी विकास चाहते है वे भी चाहते है कि उनके बच्चे पढ़े लिखे और आगे बढे । आदिवासी विकास की योजनाये बनाने वाले कौन होते है वे लोग जो उनको सुविधा दिए जाने के खिलाफ है जिनको लगता है कि आदिवासियों को आगे बढ़ने से उनका हित प्रभावित होगा , वे लोग जो आदिवासियों को सिर्फ़ वोट बैंक समझते है फिर क्योकर कोई योजना सफल होगी , आदिवासी बहुल राज्यों मे कहने को तो इस वर्ग के लोगो को प्रतिनधित्व के नाम से गाडी घोड़ा दे दिया जाता है पर असलियत यही होती है कि इनको काम के अवसर नही दिए जाते इनके हाथ बाँध दिए जाते है और यदि कुछ लोग आदिवासी हित मे आवाज उठाये तो उन्हें बाहेर का रास्ता दिखा दिया जाता है , कठपुतली की तरह काम करते ये लोग अपनी अस्मिता सम्मान स्वाभिमान को भूल जाते है।भूल जाते है कि ये भी कभी गली कुचे मे आदिवासी रंग मे रंगे युवक या युवती थे कि इन्हे आदिवासियों ने क्यो यहाँ भेजा था , उन्हें भोले भले आदिवासी कुछ काम के नही लगते उन्हें तो तेज तर्रार पी ऐ चाहिए जो कुछ जुगाड़ कर सके , आदिवासियों का भोलापन सदाशयता उन्हें बेवकूफी लगती है , अपने ही वर्ग के लोगो को सताने मे इन्हे मजा आता है क्योकि दुसरे वर्ग के लोगो के सामने इनकी घिग्घी बाँध जाती है, काँप उठते है ये , लेकिन इन को अपने क्षेत्रो मे भी बैशाखी की जरुरत होती है। अपने बच्चो को बड़े बड़े स्कूल मे पढाते है लेकिन उनके गाँव मे टीचर नही मिलेंगे , चिकित्सा सुविधा नही है, पीने को साफ पानी नही ,लेकिन इन्हे तो बोतलबंद पानी मिल जाता है फिर ये क्यो सोचेंगे ,योजनाओ का क्रियान्वयन मे कमीशन खोरी भ्रस्ताचार ने आदिवासी विकास की सारी योजनाओ को नष्ट कर दिया है, आबंटित बजट को कागजो मे खर्च दिखा कर आदिवासी योजनाओ का महल खडा हो जाता है , जितनी आदिवासी इलाके है वहा दलाल लोग हर गाँव मे दिखेंगे कुछ ने सिर्फ़ आदिवासियों के वनोपज को सस्ते दामो मे खरीद कर बड़े आलिशान बंगलो के मालिक बन गए , इन इलाको के कुछ नेता अलग परेशां है कि आरक्षण के कारण उन्हें नेतागिरी का मौका नही मिल रहा । आख़िर क्या हल है इसका ?आदिवासी अंचलो मे संशाधनों की कमी नही लेकिन उसका दोहन नही हो रहा ,हो भी रहा तो उसका लाभ कोई और ले रहा , अधिकांश आदिवासी अंचल नक्सल पीड़ित अलग से है ही ,और इन सबके बीच आदिवासी दो पाटो के बीच पीस रहे

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