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शनिवार, 16 जनवरी 2010

गंगा तट पर जुटी आस्था




भारत ही नहीं, बल्कि संसार का सबसे बडा अध्यात्मिक आयोजन है कुंभ। कुंभ की परंपरा बहुत प्राचीन है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें वैदिक सभ्यता की झांकी भी मिलती है।
इस महापर्वमें देश के कोने-कोने से असंख्य धर्मपरायण श्रद्धालुगण, संत-महात्मा और धर्मगुरु भाग लेते हैं। कुंभ के आयोजन की पृष्ठभूमि में एक धार्मिक कथा है, जिसमें देवताओं और दानवों द्वारा समुद्र-मंथन करके अमृत प्राप्त करने का प्रसंग आता है।
[समुद्र-मंथन:] स्कंदपुराणके अनुसार, अमृत-प्राप्ति के उद्देश्य से देवताओं और दैत्यों ने मिलकर मंदराचलपर्वत को मथानी और नागराज वासुकिको रस्सी बनाकर समुद्र-मंथन किया। इससे चौदह महारत्ननिकले। धन्वंतरि [चिकित्सा-देवता] अमृत से भरे कुंभ [कलश] लेकर समुद्र से निकले। देवताओं के संकेत पर देवराज इंद्र के पुत्र जयंत उस अमृतकुंभको लेकर भागे। दैत्यगुरुशुक्राचार्यके आदेश पर दैत्यों ने उस कुंभ को छीनने के लिए जयंत का पीछा किया। इसे देखकर अमृतकलशकी रक्षा के लिए देवगण भी दौड पडे। अमृत की प्राप्ति के लिए देवों और दैत्यों में बारह दिव्य दिन [मनुष्यों के 12वर्ष] तक भयंकर युद्ध हुआ।
दोनों दलों के संघर्ष के दौरान कुंभ से अमृत की बूंदेंचार स्थानों-प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन,नासिक पर गिरीं। मान्यता है कि इसीलिए हर 12साल में इन चारों स्थानों पर कुंभ पर्व आयोजित होता है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर अमृत को देवताओं में बांट दिया, लेकिन एक दैत्य देव-रूप धारण करके देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृत पीने में सफल हो गया।
कहते हैं कि श्रीहरिने अपने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक काट दिया, लेकिन अमर हो जाने के कारण उस दैत्य का मस्तक राहु तथा धड केतु के नाम से अस्तित्व में आ गया। अमृत-कुंभ की रक्षा में सूर्य, बृहस्पति और चंद्रमा ने विशेष सहायता की थी। इसी कारण सूर्य, बृहस्पति और चंद्र-इन तीन ग्रहों के विशिष्ट संयोग में ही कुंभ महापर्वमनाया जाता है।


मान्यता है कि ऐसी अति विशिष्ट ग्रह-स्थिति से बने कुंभ योग में हरिद्वार [गंगाद्वार] में गंगा में स्नान करने वाला पुनर्जन्म नहीं लेता।
वृंदावन में कुंभ [बैठक] :प्राचीनकाल से प्रचलित परंपरा के अनुसार, श्रीधामवृंदावन में हरिद्वार के कुंभ से पूर्व वैष्णवों की बैठक पर आयोजित कुंभ-मेला वसंत पंचमी [20 जनवरी] से फाल्गुनी पूर्णिमा [28 फरवरी] तक रहेगा। इसमें प्रथम स्नान-20 जनवरी [बसंत पंचमी], द्वितीय स्नान-30 जनवरी [माघी पूर्णिमा] और तृतीय स्नान-13 फरवरी [फाल्गुनी अमावस्या] को होगा। कुछ विद्वानों के मतानुसार, भैमीएकादशी, फाल्गुन कृष्णा एकादशी, महाशिवरात्रि और [फाल्गुन शुक्ल एकादशी] को भी स्नान महापुण्यदायकरहेगा।
[आध्यात्मिक लाभ:] कुंभ-स्नान के माहात्म्य का गुणगान करते हुए एक श्लोक में कहा गया है-
अश्वमेधसहस्त्राणिवाजपेयशतानिच।लक्षंप्रदक्षिणा भूमे:कुंभस्नानेतत्फलम्॥
एक हजार अश्वमेध यज्ञ, सौ वाजपेययज्ञ और एक लाख बार पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो फल मिलता है, वही फल कुंभ-स्नान से प्राप्त हो जाता है। हरिद्वार में पूर्णकुंभका योग 12वर्षो के लंबे अंतराल के बाद बनता है। इसलिए हमें इस महापर्वसे आध्यात्मिक लाभ अवश्य लेना चाहिए। लाखों-करोडों लोगों की आस्था से जुडे इस पर्व में साधु-संन्यासी और गृहस्थ मिल-जुल कर भाग लेते हैं।
अमृत पाने की चाह उन्हें कुंभ में ले आती है। ऐसी धारणा है कि कुंभ के पर्वकालमें अमृत पृथ्वी पर आता है। वास्तव में, कुंभ स्नान-दान का महापर्वहै, जो हमें सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाकर सद्गति प्रदान करता है। भारतीय संस्कृति को संपूर्ण विश्व के समक्ष उजागर करने वाला महाकुंभअध्यात्म के अमृत में डुबकी लगवाकर भव-बंधन से मुक्ति देता है। आत्मोन्नतिके ऐसे सुअवसर को हमें हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। -[मुख्य स्नान]
14जनवरी- मकर संक्रांति
15जनवरी- मौनी अमावस्या, सूर्यग्रहण
20जनवरी- बसंत पंचमी
30 जनवरी- माघी पूर्णिमा
12फरवरी- महाशिवरात्रि- शाही स्नान
15मार्च-सोमवती अमावस्या-शाही स्नान
16मार्च- नवसंवतारंभ
24मार्च- श्रीरामनवमी
30मार्च- चैत्र पूर्णिमा -[वैष्णव अखाडों का स्नान]
14अप्रैल- मेष संक्रांति- शाही स्नान, पूर्णकुंभयोग
28अप्रैल- पुरुषोत्तमीवैशाख पूर्णिमा


Mahak Singh

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