कृष्ण नंद के घर पर रहकर बड़े हुए थे। बढ़ते हुए बालक की मनोहर गति विचित्र भाव भंगियों और भोली तथा प्यारी बातों का सूर दास ने बड़ा सुंदर वर्णन किया है। यह वही बातें हैं जो प्रत्येक बालक बड़ा होते समय करता है और जिन्हें लगभग सभी माता-पिता देखते हैं और देखकर प्रसन्न होते हैं।
कृष्ण का घुटनों के बल चलना खड़े होकर लड़खड़ाते हुए चलने का प्रयत्न करना तरह-तरह के छोटे-छोटे हट और शरारतों का सूरदास ने ऐसा मानोहारी वर्णन किया है कि कोई भी बात छूट नहीं पाई है मक्खन चुरा कर खा लेना कृष्ण को बड़ा प्रिय था । अपने ही घर में नहीं बल्कि पड़ोस की गोपियों के यहां से भी वह माखन चुरा लाते थे। पकड़े जाने पर ऐसे बहाने बनाते थे कि उन्हें पकड़कर माँ यशोदा के पास लाने वाली गोपियों को भी हंसी आ जाती थी।
तथा कृष्ण के बड़े होने पर उनके ग्वालो के साथ गाय चराने के लिए बन में जाने लगे। वह सभी ग्वालो के साथ खेलते और कभी उनसे झगड़ते कभी ग्वाल उन्हें छेड़ते कहते तुम नंद के बालक नहीं हो नंद और यशोदा दोनों गोरे हैं और तुम हो काले, तुम्हें तो उन्होंने कहीं से खरीदा है।
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