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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

सभी काम श्रेष्ठ है कोई भी काम छोटा-बडा नहीं होता


स्वामी विवेकानंद ने कर्तव्य और कर्मयोग को सर्वोपरि बताया है। कोई भी काम छोटा-बडा नहीं होता, यह उनके इस व्याख्यान से पता चलता है..

यदि कोई मनुष्य संसार से विरक्त होकर ईश्वरोपासना में लग जाए, तो उसे यह नहीं समझना चाहिए कि जो लोग संसार में रहकर संसार के हित के लिए कार्य करते हैं, वे ईश्वर की उपासना नहीं करते। संसार के हित में काम करना भी एक उपासना ही है। अपने-अपने स्थान पर सभी बडे हैं।

इस संबंध में मुझे एक कहानी का स्मरण आ रहा है। एक राजा था। वह संन्यासियों से सदैव पूछा करता था-संसार का त्याग कर जो संन्यास ग्रहण करता है, वह श्रेष्ठ है, या संसार में रहकर जो गृहस्थ के कर्तव्य निभाता है?

नगर में एक तरुण संन्यासी आए। राजा ने उनसे भी यही प्रश्न किया। संन्यासी ने कहा, हे राजन् अपने-अपने स्थान पर दोनों ही श्रेष्ठ हैं, कोई भी कम नहीं है। राजा ने उसका प्रमाण मांगा। संन्यासी ने उत्तर दिया, हां, मैं इसे सिद्ध कर दूंगा, परंतु आपको कुछ दिन मेरे साथ मेरी तरह जीवन व्यतीत करना होगा। राजा ने संन्यासी की बात मान ली।

वे एक बडे राज्य में आ पहुंचे। राजधानी में उत्सव मनाया जा रहा था। घोषणा करने वाले ने चिल्लाकर कहा, इस देश की राजकुमारी का स्वयंवर होने वाला है। जिस राजकुमारी का स्वयंवर हो रहा था, वह संसार में अद्वितीय सुंदरी थी और उसका भावी पति ही उसके पिता के बाद उसके राज्य का उत्तराधिकारी होने वाला था। इस राजकुमारी का विचार एक अत्यंत सुंदर पुरुष से विवाह करने का था, परंतु उसे योग्य व्यक्ति मिलता ही न था।

राजकुमारी रत्‍‌नजटित सिंहासन पर बैठकर आई। उसके वाहक उसे एक राजकुमार के सामने से दूसरे के सामने ले गए। इतने ही में वहां एक दूसरा तरुण संन्यासी आ पहुंचा। वह इतना सुंदर था कि मानो सूर्यदेव ही आकाश छोडकर उतर आए हों। राजकुमारी का सिंहासन उसके समीप आया और ज्यों ही उसने संन्यासी को देखा, त्यों ही वह रुक गई और उसके गले में वरमालाडाल दी।

तरुण संन्यासी ने एकदम माला को रोक लिया और कहा, मैं संन्यासी हूं मुझे विवाह से क्या प्रयोजन? राजा ने उससे कहा, देखो, मेरी कन्या के साथ तुम्हें मेरा आधा राज्य अभी मिल जाएगा और संपूर्ण राज्य मेरी मृत्यु के बाद। लेकिन संन्यासी वह सभा छोडकर चला गया। राजकुमारी इस युवा पर इतनी मोहित हो गई कि युवा संन्यासी के पीछे-पीछे चल पडी।

दूसरे राज्य के राजा को लेकर आए संन्यासी भी पीछे-पीछे चल दिए। जंगल में जाकर संन्यासी नजरों से ओझल हो गया। हताश होकर राजकुमारी वृक्ष के नीचे बैठ गई। इतने में राजा और संन्यासी उसके पास आ गए। रात हो गई थी। उस पेड की एक डाली पर एक छोटी चिडिया, उसकी स्त्री तथा उसके तीन बच्चे रहते थे। उस चिडिया ने पेड के नीचे इन तीन लोगों को देखा और अपनी स्त्री से कहा, देखो हमारे यहां ये लोग अतिथि हैं, जाडे का मौसम है। आग जलानी चाहिए। वह एक जलती हुई लकडी का टुकडा अपनी चोंच में दबा कर लाया और उसे अतिथियों के सामने गिरा दिया। उन्होंने उसमें लकडी लगा-लगाकर आग तैयार कर ली, परंतु चिडिया को संतोष नहीं हुआ। उसने अपनी स्त्री से फिर कहा, ये लोग भूखे हैं। हमारा धर्म है कि अतिथि को भोजन कराएं। यह कहकर वह आग में कूद पडा और भुन गया। उस चिडिया की स्त्री ने मन में कहा, ये तो तीन लोग हैं, उनके भोजन के लिए केवल एक ही चिडिया पर्याप्त नहीं। पत्‍‌नी के रूप में मेरा कर्तव्य है कि अपने पति के परिश्रमों को मैं व्यर्थ न जाने दूं। वह भी आग में गिर गई और भुन गई। इसके बाद उन तीन छोटे बच्चों ने भी यही किया।

तब संन्यासी ने राजा से कहा, देखो राजन, तुम्हें अब ज्ञात हो गया है कि अपने-अपने स्थान में सब बडे हैं। यदि तुम संसार में रहना चाहते हो, तो इन चिडियों के समान रहो, दूसरों के लिए अपना जीवन दे देने को सदैव तत्पर रहो। और यदि तुम संसार छोडना चाहते हो, तो उस युवा संन्यासी के समान हो, जिसके लिए वह परम सुंदरी स्त्री और एक राज्य भी तृणवत था। अपने-अपने स्थान में सब श्रेष्ठ हैं, परंतु एक का कर्तव्य दूसरे का कर्तव्य नहीं हो सकता।

महक सिंह

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

भारत की शानदार जीत

विशाल लक्ष्य के आगे भारत की शुरुआत अच्छी नहीं हुई और अपना पहला मैच खेल रहे शिखर धवन खाता खोले बगैर ही पारी की दूसरी ही गेंद पर बोल्ड हो गए। शुरुआत झटके के बाद मुरली विजय ने नए बल्लेबाज कोहली के साथ पारी को आगे बढ़ाया और स्कोर 35 तक ले गए। विजय जब बड़ी पारी की ओर बढ़ रहे थे तभी मैक्के की बाहर जाती गेंद पर बल्ला लगा बैठे जिसे विकेटकीपर पैने ने लपक लिया। विजय ने 15 रनों का योगदान दिया। दो विकेटों के पतन के बाद युवराज क्रीज पर आए। शुरू में वह गेंद को ठीक से खेलने में असहज दिखे लेकिन कुछ देर बाद उन्होंने लय पकड़ ली और कोहली के साथ 137 रन की बेजोड़ साझेदारी बनाकर टीम की जीत की आस दिखाई।
कोहली ने युवी के साथ पारी को आगे बढ़ाया। कोहली ने 69 गेंदों में अर्धशतक लगाया जबकि युवराज ने पचासा पूरा करने के लिए 64 गेंदें खेली। युवी ने बीच में कुछ अच्छे शाट भी लगाए। मैक्के ने युवराज को अपना तीसरा शिकार बनाते हुए अपनी टीम को बहुप्रतीक्षित सफलता दिलाई। युवी ने 87 गेंदों में पांच चौके लगाए। दूसरी तरफ कोहली का पराक्रम जारी था और लगातार रन बटोर रहे थे। कोहली के नए साथी रैना ने भी आतिशी पारी खेली। रैना ने चौके की बौछार लगाते हुए रन गति को तेज कर दिया। इसी बीच कोहली ने अपना शानदार शतक पूरा किया जो आस्ट्रेलिया के खिलाफ उनका पहला शतक है। शतक लगाने के बाद कोहली ने मैक्के की गेंद पर लगातार दो चौका व एक छक्का जड़ा। पूरी तरह से थक चुके कोहली ने अगले ओवर में होप्स की हल्की गेंद को उठा दिया जिसे हेस्टिंग्स ने सीमारेखा के पास लपक लिया। कोहली ने 121 गेंदों में 11 चौका व एक छक्का लगाया। कप्तान धौनी खाता खोले ही इसी ओवर में बोल्ड हो गए। दोहरे झटके के बीच रैना ने दो रन लेकर अपना 16वां अर्धशतक लगाया। नवोदित बल्लेबाज सौरभ तिवारी ने छोटी लेकिन बढि़या पारी खेली और 17 गेंदों में 12 रन बनाकर नाबाद लौटे।
Mahak Singh

मंगलवार, 4 मई 2010

A Country Fair

Drive me out of my mind, O Mother!What use is esoteric knowledge Or philosophical knowledgeTransport me totally with the burning wine Of your all-embracing love.Mother of mystery, who imbues with mystery The hearts of those who love you,Immerse me irretrievablyIn the stormy ocean without boundary,Pure love, pure love, pure love.

I Am He

Mind, nor intellect, nor ego, feeling;Sky nor earth nor metals am I.I am He, I am He, Blessed spirit, I am He!No birth, no death, no caste have I;Father, mother, have I none.I am He, I am He, Blessed spirit, I am He!Beyond the flights of fancy, formless am I,Permeating the limbs of all life;Bondage I do not fear; I am free, ever free.I am He, I am He, Blessed spirit, I am He!

शनिवार, 16 जनवरी 2010

गंगा तट पर जुटी आस्था




भारत ही नहीं, बल्कि संसार का सबसे बडा अध्यात्मिक आयोजन है कुंभ। कुंभ की परंपरा बहुत प्राचीन है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें वैदिक सभ्यता की झांकी भी मिलती है।
इस महापर्वमें देश के कोने-कोने से असंख्य धर्मपरायण श्रद्धालुगण, संत-महात्मा और धर्मगुरु भाग लेते हैं। कुंभ के आयोजन की पृष्ठभूमि में एक धार्मिक कथा है, जिसमें देवताओं और दानवों द्वारा समुद्र-मंथन करके अमृत प्राप्त करने का प्रसंग आता है।
[समुद्र-मंथन:] स्कंदपुराणके अनुसार, अमृत-प्राप्ति के उद्देश्य से देवताओं और दैत्यों ने मिलकर मंदराचलपर्वत को मथानी और नागराज वासुकिको रस्सी बनाकर समुद्र-मंथन किया। इससे चौदह महारत्ननिकले। धन्वंतरि [चिकित्सा-देवता] अमृत से भरे कुंभ [कलश] लेकर समुद्र से निकले। देवताओं के संकेत पर देवराज इंद्र के पुत्र जयंत उस अमृतकुंभको लेकर भागे। दैत्यगुरुशुक्राचार्यके आदेश पर दैत्यों ने उस कुंभ को छीनने के लिए जयंत का पीछा किया। इसे देखकर अमृतकलशकी रक्षा के लिए देवगण भी दौड पडे। अमृत की प्राप्ति के लिए देवों और दैत्यों में बारह दिव्य दिन [मनुष्यों के 12वर्ष] तक भयंकर युद्ध हुआ।
दोनों दलों के संघर्ष के दौरान कुंभ से अमृत की बूंदेंचार स्थानों-प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन,नासिक पर गिरीं। मान्यता है कि इसीलिए हर 12साल में इन चारों स्थानों पर कुंभ पर्व आयोजित होता है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर अमृत को देवताओं में बांट दिया, लेकिन एक दैत्य देव-रूप धारण करके देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृत पीने में सफल हो गया।
कहते हैं कि श्रीहरिने अपने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक काट दिया, लेकिन अमर हो जाने के कारण उस दैत्य का मस्तक राहु तथा धड केतु के नाम से अस्तित्व में आ गया। अमृत-कुंभ की रक्षा में सूर्य, बृहस्पति और चंद्रमा ने विशेष सहायता की थी। इसी कारण सूर्य, बृहस्पति और चंद्र-इन तीन ग्रहों के विशिष्ट संयोग में ही कुंभ महापर्वमनाया जाता है।


मान्यता है कि ऐसी अति विशिष्ट ग्रह-स्थिति से बने कुंभ योग में हरिद्वार [गंगाद्वार] में गंगा में स्नान करने वाला पुनर्जन्म नहीं लेता।
वृंदावन में कुंभ [बैठक] :प्राचीनकाल से प्रचलित परंपरा के अनुसार, श्रीधामवृंदावन में हरिद्वार के कुंभ से पूर्व वैष्णवों की बैठक पर आयोजित कुंभ-मेला वसंत पंचमी [20 जनवरी] से फाल्गुनी पूर्णिमा [28 फरवरी] तक रहेगा। इसमें प्रथम स्नान-20 जनवरी [बसंत पंचमी], द्वितीय स्नान-30 जनवरी [माघी पूर्णिमा] और तृतीय स्नान-13 फरवरी [फाल्गुनी अमावस्या] को होगा। कुछ विद्वानों के मतानुसार, भैमीएकादशी, फाल्गुन कृष्णा एकादशी, महाशिवरात्रि और [फाल्गुन शुक्ल एकादशी] को भी स्नान महापुण्यदायकरहेगा।
[आध्यात्मिक लाभ:] कुंभ-स्नान के माहात्म्य का गुणगान करते हुए एक श्लोक में कहा गया है-
अश्वमेधसहस्त्राणिवाजपेयशतानिच।लक्षंप्रदक्षिणा भूमे:कुंभस्नानेतत्फलम्॥
एक हजार अश्वमेध यज्ञ, सौ वाजपेययज्ञ और एक लाख बार पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो फल मिलता है, वही फल कुंभ-स्नान से प्राप्त हो जाता है। हरिद्वार में पूर्णकुंभका योग 12वर्षो के लंबे अंतराल के बाद बनता है। इसलिए हमें इस महापर्वसे आध्यात्मिक लाभ अवश्य लेना चाहिए। लाखों-करोडों लोगों की आस्था से जुडे इस पर्व में साधु-संन्यासी और गृहस्थ मिल-जुल कर भाग लेते हैं।
अमृत पाने की चाह उन्हें कुंभ में ले आती है। ऐसी धारणा है कि कुंभ के पर्वकालमें अमृत पृथ्वी पर आता है। वास्तव में, कुंभ स्नान-दान का महापर्वहै, जो हमें सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाकर सद्गति प्रदान करता है। भारतीय संस्कृति को संपूर्ण विश्व के समक्ष उजागर करने वाला महाकुंभअध्यात्म के अमृत में डुबकी लगवाकर भव-बंधन से मुक्ति देता है। आत्मोन्नतिके ऐसे सुअवसर को हमें हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। -[मुख्य स्नान]
14जनवरी- मकर संक्रांति
15जनवरी- मौनी अमावस्या, सूर्यग्रहण
20जनवरी- बसंत पंचमी
30 जनवरी- माघी पूर्णिमा
12फरवरी- महाशिवरात्रि- शाही स्नान
15मार्च-सोमवती अमावस्या-शाही स्नान
16मार्च- नवसंवतारंभ
24मार्च- श्रीरामनवमी
30मार्च- चैत्र पूर्णिमा -[वैष्णव अखाडों का स्नान]
14अप्रैल- मेष संक्रांति- शाही स्नान, पूर्णकुंभयोग
28अप्रैल- पुरुषोत्तमीवैशाख पूर्णिमा


Mahak Singh

Commonwealth Games 2022 Days 6

  Commonwealth Games 2022 Day 6:  राष्ट्रमंडल खेल 2022 में अब तक भारत ने कुल 18 पदक जीते हैं, जिसमें पांच स्वर्ण, छह रजत और सात कांस्य पदक श...