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मंगलवार, 17 नवंबर 2009

आदिवासी समस्याओं






आदिवासी किसी राज्य या क्षेत्र विशेष में नहीं हैं, बल्कि पूरे देश में फैले हैं। ये कहीं नक्सलवाद से जूझ रहे हैं तो कहीं अलगाववाद की आग में जल रहे हैं। जल, जंगल और जमीन को लेकर इनका शोषण निरंतर चला आ रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय मुद्दे- आतंकवाद, स्विस बैंक से काला धन वापस लाने, महँगाई, स्थिर और मजबूत सरकार के नाम पर जनता से वोट बटोरने की नीति को महज राजनीतिक स्टंट ही कहा जाएगा। देश के लगभग 7 करोड़ आदिवासियों की अनदेखी कर तात्कालिक राजनीतिक लाभ देने वाली बातों को हवा देना एक परंपरा बन गई है।यह तो नींव के बिना महल बनाने वाली बात हो गई। राजनीतिक पार्टियाँ अगर सचमुच में देश का विकास चाहती हैं और 'आखिरी व्यक्ति' तक लाभ पहुँचाने की मंशा रखती हैं तो आदिवासी हित और उनकी समस्याओं को हल करने की बात पहले करना होगी। भारत में मिजोरम, नगालैंड व मेघालय जैसे छोटे राज्यों में 80 से 93 प्रतिशत तक आबादी आदिवासियों की है। बड़े राज्यों में मध्यप्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार, गुजरात, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 8 से 23 प्रतिशत तक आबादी आदिवासियों की है। देश में अभी भी आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवन-यापन कर रहे हैं। नक्सलवाद हो या अलगाववाद, पहले शिकार आदिवासी ही होते हैं। उड़ीसा के कंधमाल में धर्मांधता के शिकार आदिवासी हुए। छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड में आदिवासी नक्सलवाद की त्रासदी झेल रहे हैं। मेघालय, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश और कुछ आदिवासी बहुल प्रांतों में यह समुदाय अलगाववाद का शिकार समय-समय पर होता रहता है। नक्सलवाद की समस्या आतंकवाद से कहीं बड़ी है।
Mahak Singh

आदिवासी कल्याण की योजनाये सफल क्यो नही ?

आदिवासियों को समाज की मुख्य धारा मे लाने के लिए न जाने कितनी योजनाये सरकार ने बनाई किंतु आज तक उसका सही प्रतिफल उनको नही मिला ,आख़िर क्यो? क्या आदिवासी विकास नही चाहते और जैसे है वैसे ही रहना चाहते है ? नही! आदिवासी भी विकास चाहते है वे भी चाहते है कि उनके बच्चे पढ़े लिखे और आगे बढे । आदिवासी विकास की योजनाये बनाने वाले कौन होते है वे लोग जो उनको सुविधा दिए जाने के खिलाफ है जिनको लगता है कि आदिवासियों को आगे बढ़ने से उनका हित प्रभावित होगा , वे लोग जो आदिवासियों को सिर्फ़ वोट बैंक समझते है फिर क्योकर कोई योजना सफल होगी , आदिवासी बहुल राज्यों मे कहने को तो इस वर्ग के लोगो को प्रतिनधित्व के नाम से गाडी घोड़ा दे दिया जाता है पर असलियत यही होती है कि इनको काम के अवसर नही दिए जाते इनके हाथ बाँध दिए जाते है और यदि कुछ लोग आदिवासी हित मे आवाज उठाये तो उन्हें बाहेर का रास्ता दिखा दिया जाता है , कठपुतली की तरह काम करते ये लोग अपनी अस्मिता सम्मान स्वाभिमान को भूल जाते है।भूल जाते है कि ये भी कभी गली कुचे मे आदिवासी रंग मे रंगे युवक या युवती थे कि इन्हे आदिवासियों ने क्यो यहाँ भेजा था , उन्हें भोले भले आदिवासी कुछ काम के नही लगते उन्हें तो तेज तर्रार पी ऐ चाहिए जो कुछ जुगाड़ कर सके , आदिवासियों का भोलापन सदाशयता उन्हें बेवकूफी लगती है , अपने ही वर्ग के लोगो को सताने मे इन्हे मजा आता है क्योकि दुसरे वर्ग के लोगो के सामने इनकी घिग्घी बाँध जाती है, काँप उठते है ये , लेकिन इन को अपने क्षेत्रो मे भी बैशाखी की जरुरत होती है। अपने बच्चो को बड़े बड़े स्कूल मे पढाते है लेकिन उनके गाँव मे टीचर नही मिलेंगे , चिकित्सा सुविधा नही है, पीने को साफ पानी नही ,लेकिन इन्हे तो बोतलबंद पानी मिल जाता है फिर ये क्यो सोचेंगे ,योजनाओ का क्रियान्वयन मे कमीशन खोरी भ्रस्ताचार ने आदिवासी विकास की सारी योजनाओ को नष्ट कर दिया है, आबंटित बजट को कागजो मे खर्च दिखा कर आदिवासी योजनाओ का महल खडा हो जाता है , जितनी आदिवासी इलाके है वहा दलाल लोग हर गाँव मे दिखेंगे कुछ ने सिर्फ़ आदिवासियों के वनोपज को सस्ते दामो मे खरीद कर बड़े आलिशान बंगलो के मालिक बन गए , इन इलाको के कुछ नेता अलग परेशां है कि आरक्षण के कारण उन्हें नेतागिरी का मौका नही मिल रहा । आख़िर क्या हल है इसका ?आदिवासी अंचलो मे संशाधनों की कमी नही लेकिन उसका दोहन नही हो रहा ,हो भी रहा तो उसका लाभ कोई और ले रहा , अधिकांश आदिवासी अंचल नक्सल पीड़ित अलग से है ही ,और इन सबके बीच आदिवासी दो पाटो के बीच पीस रहे

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

17 हजारी बने सचिन




हैदराबाद। पिछले चार मैच में चूकने के बाद सचिन तेंदुलकर ने उप्पल के राजीव गांधी स्टेडियम में 17 हजार रन का वह जादुई आंकड़ा छू लिया जिसका न सिर्फ उनके प्रशंसकों बल्कि पूरे क्रिकेट जगत को बेसब्री से इंतजार था।
तेंदुलकर ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ पांचवें एक दिवसीय मैच में सात रन पूरे करते ही यह मुकाम हासिल किया। उन्होंने बेन हिल्फेनहास की गेंद पर स्क्वायर लेग क्षेत्र में तीन रन लेकर सत्रह हजारी बनने का गौरव हासिल किया। उन्होंने इसके तुरंत बाद बल्ला बदल दिया। तेंदुलकर पहले चार मैच में अपेक्षानुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाए थे। मोहाली में चौथे वन डे में भी जब वह 40 रन पर थे तब अंपायर ने उन्हें गलत पगबाधा आउट दे दिया जिससे उन्हें 17,000 रन पूरे करने के लिए आज तक इंतजार करना पड़ा।
मास्टर ब्लास्टर का यह 435वां मैच है और उन्होंने अब तक अपने करियर में 44 शतक और 91 अर्धशतक जमाए हैं। उन्होंने इसके अलावा 159 टेस्ट मैच में 54.58 की औसत से 12,773 रन तथा एक ट्वंटी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच में दस रन बनाए हैं। तेंदुलकर ने अपने एक दिवसीय करियर में सर्वाधिक 2827 रन आस्ट्रेलिया के खिलाफ ही बनाए हैं। इसके अलावा उन्होंने श्रीलंका [2749], पाकिस्तान [2389], न्यूजीलैंड [1750], दक्षिण अफ्रीका [1655], वेस्टइंडीज [1571], जिंबाब्वे [1377] और इंग्लैंड [1335] के खिलाफ भी 1000 से अधिक रन बनाए हैं।
तेंदुलकर के लिए नवाबों का शहर हैदराबाद हमेशा भाग्यशाली रहा है। उन्होंने इसी शहर के लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में आठ नवंबर 1999 को न्यूजीलैंड के खिलाफ नाबाद 186 रन बनाए थे जो उनका एक दिवसीय मैचों में सर्वाधिक स्कोर भी है। इस स्टार बल्लेबाज ने रिकार्ड बनने तक भारतीय सरजमीं पर 5,926 रन बनाए थे। इसके अलावा उन्होंने विदेशी धरती पर 4,873 और तटस्थ स्थान पर 6203 रन बनाए हैं।
तेंदुलकर के बाद एक दिवसीय अंतररराष्ट्रीय क्रिकेट में सर्वाधिक रन सनथ जयसूर्या के नाम पर दर्ज हैं जिन्होंने 441 मैच में 13,377 रन बनाए हैं। उनके बाद रिकी पोंटिंग [12,286 रन], इंजमाम उल हक [11,739 रन], सौरव गांगुली [11,363 रन], राहुल द्रविड़ [10,765], ब्रायन लारा [10,405 रन] और जैक्स कालिस [10,328 रन] दर्ज हैं।

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

रिवाज

दरवाजे पर दो कच्चे बांस, कफन और धूप-दीप पडा देखकर पडोसी समझ गये यहां कोई मरा है। लेकिन अंदर से कोई रोने-गाने की आवाज नहीं आ रही थी। पडोसियों को आश्चर्य हुआ और जिज्ञासा भी कि मौत के माहौल में भी लोग शांत रह लेते हैं। एक घंटा के अंदर पडोसी बिना बुलाए मंहगाई की तरह दरवाजे पर जमा होने लगे। उनमें से कुछ लोग बांस काटकर अरथी बनाने में लग गये तो कुछ लोग संभावित मुर्दा के बारे में अनुमान लगाने में। समय गुजरता रहा। दरवाजे पर जमा भीड के शोरगुल ने गृहस्वामी को बाहर निकाल ही दिया। गृहस्वामी बीस-बाईस साल का युवक था, जिसको देखकर लोगों ने सहज ही अनुमान लगा लिया कि इसको अभी कर्मकांड का अनुभव नहीं है। इसीलिए अरथी उठाने में विलम्ब हो रहा है। भीड ने पूछा- भगवान ने किसको अपने पास बुलाया? लडका-मेरे बाप को घाट ले जाना है। इतना कह कर लडका अंदर चला गया। भीड में फिर चर्चा होने लगी कि- लडका बहुत उजड्ड है। उसके चेहरे पर दु:ख का कोई लक्षण तक नहीं है। पालतू कुत्ते के मरने पर भी लोग दु:खी होते हैं, इसका तो बाप ही मरा है। लेकिन लडके की बोली तो सुनो। बाहर पडोसी और अरथी मुर्दा के बाहर आने की प्रतीक्षा करते रहे और समय गुजरता रहा। ऊबकर भीड ने लडके को बाहर बुलाकर पूछा- घाट जाने में अभी और कितनी देर है? लडका बोला- अभी मैं निर्णय कर रहा हूं कि इसका दाह संस्कार का आरंभ घर से किया जाय कि घाट से। भीड में फिर शोर उठा- ये क्या पागलों वाली बात है? दाह संस्कार तो घाट पर ही होता है। लडका- शादी-विवाह और कर्म-कांड तो सभी के यहां होता है। लेकिन सभी के यहां के रिवाज एक सा तो नहीं होता है। खैर जब पंचों की मर्जी है कि दाह संस्कार का आरंभ घाट पर ही हो तो ऐसा ही होगा, चला जाये घाट की ओर। भीड फिर बाहर प्रतीक्षा करने लगी। पांच-दस मिनट में लडके ने अपने बाप को लाकर अरथी पर लिटा दिया। भीड जब अरथी सजाने लगी तो मुर्दा बोला- अभी तो मैं जिंदा हूं। भीड में फिर शोर उठा- बाप अभी जिंदा है और लडका उसे मारने पर तुला है। क्या समय आ गया है? बाप को दो रोटी देना भी लडकों को अखरता है। लडका- बात रोटी की नहीं है। बात रिवाज की है। आदमी के जीवन-मृत्यु का हिसाब तो ऊपर से ही तय होता है। मेरे यहां का रिवाज है कि दाह संस्कार जीते जी ही किया जाता है। जब मैं पांच-छ: साल का बच्चा था, तो इस आदमी ने मेरी मां का दाह संस्कार जीते जी ही सम्पन्न किया था। भले ही इसे उसके लिए उम्र कैद की सजा हो गयी। समाज या कानून भले ही इसे हत्यारा, पत्नीहन्ता चाहे जो भी कहे, है तो मेरा बाप। मुझे तो अपनी मां की आत्मा की शांति के लिये खानदानी रिवाज निभाना ही होगा।

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009

स्टेशन पे एक कुली से बाहर जाने का रास्ता पूंछा

स्टेशन पे एक कुली से बाहर जाने का रास्ता पूंछा .कुली ने कहा: " बाहर जाके पूंछो ."मैंने ख़ुद हीरास्ता ढूंढ़ लिया ,बाहर जाके टैक्सी वाले से पूंछा :" भाई साहब लाल किले का कितना लोगे ?"जवाब मिला: " बेचना नही है ."टैक्सी छोड़ , मैंने बस पकड़ ली ,कंडक्टर से पूंछा: "जी , क्या मैं सिगरेट पी सकता हूँ ?"वो गुर्र्रा कर बोला : "हरगिज़ नही , यहाँ सिगरेट पीना मन है."मैंने कहा: "पर वो जनाब तो पी रहे है!"फिर से गुर्र्र्राया : "उसने मुझसे पूंछा नही है."लाल किले पंहुचा , होटल गया .मेनेजर से कहा: "मुझे रूम चाहिए , सातवी मंजिल पे ."मेनेजर ने कहा: "रहने के लिए या कूदने के लिए ?"रूम पंहुचा , वेटर से कहा:" एक पानी का गिलास मिलेगा ?"उसने जवाब दिया: "नही साहब , यहाँ तो सारे कांच के मिलते हैं."होटल से निकला , दोस्त के घर जाने के लिए ,रास्ते में एक साहब से पूंछा:" जनाब , ये सड़क कहाँ को जाती है ?"जनाब हंस कर बोले: "पिछले बीस साल से देख रहा हूँ , यही पड़ी है... कहीं नहीं जाती."
Mahak Singh

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

सडक पर दो कुत्ते

सडक पर दो कुत्ते आपस में लड रहे थे। पास के दुकानदार को नागवार गुजरा। उसने आवाज देकर कुत्तों को भगाना चाहा, पर कुत्ते लडते-भौकते ही रहे। तब दुकानदार ने सडक से एक बडा-सा पत्थर उठाया और चला दिया उन कुत्तों पर। इसके पहले कि उन्हें पत्थर लगता वे दोनों रफूचक्कर हो गये। और इत्तफाकन वह पत्थर पडोसी की दुकान में जा गिरा और उसका शोकेस का शीशा टूट गया। वह नाराज होकर बुरा भला कहने लगा। पत्थर चलाने वाले दुकानदार ने समझाने की कोशिश की कि उसने जानबूझकर दुकान पर पत्थर नहीं फेंका था। परंतु दूसरा दुकानदार मानने को तैयार ही नहीं था। वह दुकान में हुए नुकसान की भरपाई की मांग कर रहा था। बात यों बढी कि दोनों गाली-गलौज से मारपीट पर उतर आए और फिर ऐसे भिडे कि एक का सर फट गया। मामला पुलिस तक जा पहुंचा। पुलिस मामला दर्ज कर दोनों को वैन में बिठाकर थाने ले जा रही थी कि रास्ते में लाल सिगनल पर गाडी रुकी। पत्थर चलाने वाले ने बाहर झांका देखा, लडने वाले वही दोनों कुत्ते एक जगह बैठे उनकी तरफ कातर दृष्टि से देख रहे थे। पत्थर चलाने वाले शख्स को लगा मानो वे दोनों हम पर हंस रहे हों तथा एक दूसरे से कह रहे हों, यार, ये तो सचमुच के लड गये। दूसरे ने कहा, हां यार, हमें तो लडने की आदत है और हमारी कहावत भी जग जाहिर है परन्तु ये तो हम से भी दो कदम आगे हैं। Mahak Singh

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

द्रविड़ को छू पाएंगे धौनी, भज्जी व गंभीर!

मुंबई। पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ एकमात्र भारतीय हैं जिन्हें अब तक आईसीसी क्रिकेटर ऑफ द ईयर का पुरस्कार मिला है और अब उनके तीन साथी इस साल उनकी इस उपलब्धि की बराबरी करने की राह पर हैं।
द्रविड़ को 2004 में उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए क्रिकेटर ऑफ द ईयर और टेस्ट प्लेयर ऑफ द ईयर चुना गया था। यह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के वार्षिक पुरस्कारों का पहला साल भी था। इसके बाद 2005 से 2008 तक कोई भी भारतीय यह सम्मान हासिल नहीं कर पाया। इस साल कप्तान महेंद्र सिंह धौनी, सलामी बल्लेबाज गौतम गंभीर और ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह को विभिन्न पुरस्कारों के लिए नामित किया गया है। इन तीनों को क्रिकेटर ऑफ द ईयर और टेस्ट प्लेयर ऑफ द ईयर पुरस्कार के लिए नामांकन मिला है। वर्ष के टेस्ट खिलाड़ी के पुरस्कार की दौड़ में वीवीएस लक्ष्मण भी शामिल हैं।
धौनी को हमवतन युवराज सिंह और वीरेंद्र सहवाग के साथ वनडे प्लेयर ऑफ द ईयर की लंबी सूची में भी जगह मली। अमित मिश्रा के पास इमर्जिग प्लेयर ऑफ द ईयर बनने का मौका है। यह पुरस्कार चार साल पहले बाएं हाथ के तेज गेंदबाज इरफान पठान को मिला था। आस्ट्रेलियाई साइमन टाफेल लगातार छठी बार वर्ष के सर्वश्रेष्ठ अंपायर बनने की दौड़ में हैं। ये पुरस्कार एक अक्टूबर को जोहांसबर्ग में दिए जाएंगे।
अब तक के विजेताओं की सूची:
क्रिकेटर ऑफ द ईयर:
राहुल द्रविड़ [भारत] 2004, जैक्स कालिस [दक्षिण अफ्रीका] और एंड्रयू फ्लिंटॉफ [इंग्लैंड] 2005, रिकी पोंटिंग [आस्ट्रेलिया] 2006, 2007, शिवनारायण चंद्रपाल [वेस्टइंडीज] 2008।
टेस्ट प्लेयर ऑफ द ईयर:
राहुल द्रविड़ [2004], जैक्स कालिस [2005], रिकी पोंटिंग [2006], मोहम्मद यूसुफ [पाकिस्तान] 2007, डेल स्टेन [दक्षिण अफ्रीका] 2008।
वनडे प्लेयर ऑफ द ईयर:
एंड्रयू फ्लिंटॉफ [2004], केविन पीटरसन [इंग्लैंड] 2005, माइकल हसी [आस्ट्रेलिया] 2006, मैथ्यू हेडन [आस्ट्रेलिया] 2007, महेंद्र सिंह धौनी [भारत] 2008।
इमर्जिग प्लेयर ऑफ द ईयर:
इरफान पठान [भारत] 2004, केविन पीटरसन [2005], इयान बेल [इंग्लैंड] 2006, शॉन टैट [आस्ट्रेलिया] 2007, अजंथा मेंडिस [श्रीलंका] 2008।
टी-20 प्लेयर ऑफ द ईयर:
युवराज सिंह [भारत] 2008।
वूमैन क्रिकेटर ऑफ द ईयर:
कारेन राल्टन [आस्ट्रेलिया] 2006, झूलन गोस्वामी [भारत] 2007, चार्लोटी एडव‌र्ड्स [इंग्लैंड] 2008।
अंपायर ऑफ द ईयर:
साइमन टाफेल [आस्ट्रेलिया] 2004 से 2008 तक।

रविवार, 23 अगस्त 2009

भारत भर में ज्यादातर हिंदू परिवारों में भगवान गणेश की पूजा होती है। सनातन धर्म को मानने वाले सभी संप्रदाय विघ्नेश्वरगणेश की पूजा सबसे पहले करते हैं। महाराष्ट्र में मराठा श्रद्धालु गणपति को अपना आराध्य मानते हैं।
श्रीमंत पेशवा-सरकार गणेशजीकी उपासक थीं। उनके शासनकाल में गणेशोत्सवराजकीय ठाट-बाट के साथ मनाया जाता था। श्रीमंत सवाई माधवराव के शासनकाल में यह महोत्सव शनिवारवाडाके गणेश महल में आयोजित होता। उस समय यह उत्सव छ:दिनों तक चलता था। गणेशजीकी प्रतिमा के विसर्जन की शोभायात्रा ओंकारेश्वरघाट पहुंचती, जहां नदी में विग्रह का होता था विसर्जन। इसी तरह अन्य मराठा सरदारों के यहां भी गणेशोत्सवआयोजित होते।
दस दिनों का त्योहार :वर्ष 1892ई. तक मराठा-नरेशों के महलों तक सीमित था गणेशोत्सव।लोकमान्य तिलक की प्रेरणा और प्रयासों से वर्ष 1893ई. में पुणे में इसे सार्वजनिक रूप से मनाने की शुरुआत हुई। उन्होंने छ:दिनों के इस धार्मिक अनुष्ठान को दस दिन का सार्वजनिक उत्सव बना दिया। गणेश पुराण के अनुसार, भादो माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी के दिन गणेशजीप्रकट हुए।
इसलिए भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्थी के दिन गणेश-प्रतिमा की स्थापना और भाद्रपद-शुक्ल-चतुर्दशी को विसर्जन की प्रथा बन गई। राष्ट्रीय उत्सव : केसरी पत्रिका में उस समय के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी खानखोजेने यह विचार प्रकट किया था कि पुणे में लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में गणेश-उत्सव न केवल देशभक्ति के प्रचार का माध्यम, बल्कि राष्ट्रीय उत्सव भी बन गया। पूणेके अलावा, मुंबई, अमरावती, वर्धा, नागपुर में भी सार्वजनिक गणेश-उत्सव मनाया जाने लगा। सच तो यह है कि इस उत्सव के माध्यम से क्रांतिकारियों को संगठित करने का कार्य होने लगा। धार्मिक उत्सव होने के कारण अंग्रेज सरकार भी इसमें हस्तक्षेप नहीं कर पाती थी।

प्राकृतिक और मानवीय आपदाओं

प्राकृतिक और मानवीय आपदाओं में इनसान, जानवरों, प्राकृतिक व धन-संपत्ति का नुकसान समाज और जन-जीवन को झकझोर कर रख देता है। ऐसी विभीषिकाओं के शिकार बने लोगों की मदद करने, उन्हें उबारने और उनके जीवन को फिर से पटरी पर लाने में आपदा प्रबंधन से जुडे लोगों का बडा हाथ होता है। सरकार, एनजीओ, अनेक निजी संस्थान आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में प्रशिक्षित पेशेवरों की मांग तेजी से बढती जा रही है।
जरूरत क्यों?
भारत में बहुत से क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के लिए अति संवेदनशील हैं। एक अनुमानित आंकडा बताता है कि पिछले बीस सालों में पूरे विश्व में जमीन खिसकने, भूकंप, बाढ, सुनामी, बर्फ की चट्टान सरकने और चक्रवात जैसी आपदाओं में लगभग तीस लाख से अधिक लोगों की जान चली गई। यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि विश्व भर में आईं प्राकृतिक आपदाओं में लगभग 90 प्रतिशत विकासशील देशों के हिस्से पडीं। देश की 70 प्रतिशत खेतिहर जमीन सूखे की आशंका की जद में है। वहीं कुल जमीन का 60 फीसदी हिस्सा भूकंप के प्रति संवेदनशील है, 12 प्रतिशत बाढ और 8 प्रतिशत चक्रवात के लिए।
पिछले कुछ दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था में काफी बदलाव आया है। आर्थिक उदारीकरण के बाद एक तरफ जहां भारतीय दरवाजा विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए खुल गया, वहीं भारतीय कंपनियों ने भी अपने नए वेंचर अमेरिका, यूरोप, जापान आदि जैसे देशों में खोलने शुरू कर दिए। जिस तरह से आज अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक गतिविधियां बढ रही है, उसे देखते हुए इस क्षेत्र में काफी ब्राइट करियर की उम्मीद की जा सकती है।
Mahak Singh

Commonwealth Games 2022 Days 6

  Commonwealth Games 2022 Day 6:  राष्ट्रमंडल खेल 2022 में अब तक भारत ने कुल 18 पदक जीते हैं, जिसमें पांच स्वर्ण, छह रजत और सात कांस्य पदक श...